श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.7.9

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

एवं वर्षायुतसहस्रपर्यन्तावसितकर्मनिर्वाणावसरोऽधिभुज्यमानं४ स्वतनयेभ्यो रिक्थं पितृपैतामहं यथादायं विभज्य स्वयं सकलसम्पन्‍निकेतात्स्वनिकेतात् पुलहाश्रमं५ प्रवव्राज॥ ८॥ यत्र ह वाव भगवान् हरिरद्यापि तत्रत्यानां निजजनानां वात्सल्येन संनिधाप्यत इच्छारूपेण॥ ९॥ यत्राश्रमपदान्युभयतोनाभिभिर्दृषच्चक्रैश्‍चक्रनदी नाम सरित्प्रवरा सर्वतः पवित्रीकरोति॥ १०॥✎ 934

yatra ha vāva bhagavān hariradyāpi tatratyānāṃ nijajanānāṃ vātsalyena saṃnidhāpyata icchārūpeṇa|| 9||

अर्थ

इस पुलहाश्रममें रहनेवाले भक्तोंपर भगवान्का बड़ा ही वात्सल्य है। वे आज भी उनसे उनके इष्टरूपमें मिलते रहते हैं॥ ९॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—वसरो विभुज्यमानं तनयेभ्यः पितृ०।

    (मुद्रित पृष्ठ 604)
  2. ५

    प्रा० पा०—पुलहश्रममेष प्र०।

    (मुद्रित पृष्ठ 604)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #934 शब्दोंके बीचका स्थान: इच्छारूपेण॥९॥ → इच्छारूपेण॥ ९॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें