श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.8.21

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

अपि बत स वै कृपण एणबालको मृतहरिणीसुतोऽहो ममानार्यस्य शठकिरातमतेरकृतसुकृतस्य कृतविस्रम्भ आत्मप्रत्ययेन तदविगणयन् सुजन इवागमिष्यति॥ १६॥ अपि क्षेमेणास्मिन्‍नाश्रमोपवने शष्पाणि चरन्तं देवगुप्तं द्रक्ष्यामि॥ १७॥ अपि च न वृकः सालावृकोऽन्यतमो वा नैकचर एकचरो वा भक्षयति॥ १८॥ निम्लोचति ह भगवान् सकलजगत‍्क्षेमोदयस्त्रय्यात्माद्यापि मम न मृगवधून्यास आगच्छति॥ १९॥ अपिस्विदकृतसुकृतमागत्य मां सुखयिष्यति हरिणराजकुमारो विविधरुचिरदर्शनीयनिजमृगदारकविनोदैरसन्तोषं स्वानामपनुदन्॥ २०॥ क्ष्वेलिकायां मां मृषासमाधिनाऽऽमीलितदृशं प्रेमसंरम्भेण चकितचकित आगत्य पृषदपरुषविषाणाग्रेण लुठति॥ २१॥ आसादितहविषि बर्हिषि दूषिते मयोपालब्धो भीतभीतः सपद्युपरतरास ऋषिकुमारवद् अवहितकरणकलाप आस्ते॥ २२॥✎ 938

kṣvelikāyāṃ māṃ mṛṣāsamādhinā''mīlitadṛśaṃ premasaṃrambheṇa cakitacakita āgatya pṛṣadaparuṣaviṣāṇāgreṇa luṭhati|| 21||

अर्थ

अहो! जब कभी मैं प्रणयकोपसे खेलमें झूठ-मूठ समाधिके बहाने आँखें मूँदकर बैठ जाता, तब वह चकित चित्तसे मेरे पास आकर जलबिन्दुके समान कोमल और नन्हें-नन्हें सींगोंकी नोकसे किस प्रकार मेरे अंगोंको खुजलाने लगता था॥ २१॥✎ 444

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #444 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #938 शब्दोंके बीचका स्थान: भक्षयति॥१८॥ → भक्षयति॥ १८॥

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