tatrāpi ha vā ātmano mṛgatvakāraṇaṃ bhagavadārādhanasamīhānubhāvenānusmṛtya bhṛśamanutapyamāna āha || 28||
अर्थ
उस योनिमें भी पूर्वजन्मकी भगवदाराधनाके प्रभावसे अपने मृगरूप होनेका कारण जानकर वे अत्यन्त पश्चात्ताप करते हुए कहने लगे,॥ २८॥
तत्रापि ह वा आत्मनो मृगत्वकारणं भगवदाराधनसमीहानुभावेनानुस्मृत्य भृशमनुतप्यमान आह ॥ २८॥
उस योनिमें भी पूर्वजन्मकी भगवदाराधनाके प्रभावसे अपने मृगरूप होनेका कारण जानकर वे अत्यन्त पश्चात्ताप करते हुए कहने लगे,॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.8.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 610) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/8/28/