श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.9.12

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

अथ कदाचित्कश्चिद् वृषलपतिर्भद्रकाल्यै४ पुरुषपशुमालभतापत्यकामः॥ १२॥ तस्य ह दैवमुक्तस्य पशोः पदवीं तदनुचराः परिधावन्तो निशि निशीथसमये तमसाऽऽवृतायामनधिगतपशव आकस्मिकेन विधिना केदारान् वीरासनेन मृगवराहादिभ्यः संरक्षमाणमङ्गिरःप्रवरसुतमपश्यन्॥ १३॥

atha kadācitkaścid vṛṣalapatirbhadrakālyai puruṣapaśumālabhatāpatyakāmaḥ|| 12||

अर्थ

किसी समय डाकुओंके सरदारने, जिसके सामन्त शूद्र जातिके थे, पुत्रकी कामनासे भद्रकालीको मनुष्यकी बलि देनेका संकल्प किया॥ १२॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—भद्रकाल्यै पशुमालभता।

    (मुद्रित पृष्ठ 613)

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