श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.60

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

मत्तया विश्लथन्‍नीव्या व्यपेतं निरपत्रपम्।

क्रीडन्तमनु गायन्तं हसन्तमनयान्तिके॥ ६०

mattayā viślathannīvyā vyapetaṃ nirapatrapam|

krīḍantamanu gāyantaṃ hasantamanayāntike|| 60

अर्थ

लौटते समय इसने देखा कि एक भ्रष्ट शूद्र, जो बहुत कामी और निर्लज्ज है, शराब पीकर किसी वेश्याके साथ विहार कर रहा है। वेश्या भी शराब पीकर मतवाली हो रही है। नशेके कारण उसकी आँखें नाच रही हैं, वह अर्द्धनग्न अवस्थामें हो रही है। वह शूद्र उस वेश्याके साथ कभी गाता, कभी हँसता और कभी तरह-तरहकी चेष्टाएँ करके उसे प्रसन्‍न करता है॥ ५९-६०॥

यह अर्थ श्लोक 59–60 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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