श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.62

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

स्तम्भयन्‍नात्मनाऽऽत्मानं यावत्सत्त्वं यथाश्रुतम्।

न शशाक समाधातुं मनो मदनवेपितम्॥ ६२

stambhayannātmanā''tmānaṃ yāvatsattvaṃ yathāśrutam|

na śaśāka samādhātuṃ mano madanavepitam|| 62

अर्थ

यद्यपि अजामिलने अपने धैर्य और ज्ञानके अनुसार अपने कामवेगसे विचलित मनको रोकनेकी बहुत-बहुत चेष्टाएँ कीं, परन्तु पूरी शक्ति लगा देनेपर भी वह अपने मनको रोकनेमें असमर्थ रहा॥ ६२॥

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