श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.11.12

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

न सन्‍नवाहाय विषण्णचेतसे

प्रायुङ्क्त भूयः स गदां महात्मा।

इन्द्रोऽमृतस्यन्दिकराभिमर्श-

वीतव्यथक्षतवाहोऽवतस्थे ॥ १२

na sannavāhāya viṣaṇṇacetase

prāyuṅkta bhūyaḥ sa gadāṃ mahātmā|

indro'mṛtasyandikarābhimarśa-

vītavyathakṣatavāho'vatasthe || 12

अर्थ

देवराज इन्द्र अपने वाहन ऐरावतके मूर्च्छित हो जानेसे स्वयं भी विषादग्रस्त हो गये। यह देखकर युद्धधर्मके मर्मज्ञ वृत्रासुरने उनके ऊपर फिरसे गदा नहीं चलायी। तबतक इन्द्रने अपने अमृतस्रावी हाथके स्पर्शसे घायल ऐरावतकी व्यथा मिटा दी और वे फिर रणभूमिमें आ डटे॥ १२॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें