श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.11.16

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

ह्रीश्रीदयाकीर्तिभिरुज्झितं त्वां

स्वकर्मणा पुरुषादैश्‍च गर्ह्यम्।

कृच्छ्रेण मच्छूलविभिन्‍नदेह-

मस्पृष्टवह्निं समदन्ति गृध्राः॥ १६

hrīśrīdayākīrtibhirujjhitaṃ tvāṃ

svakarmaṇā puruṣādaiśca garhyam|

kṛcchreṇa macchūlavibhinnadeha-

maspṛṣṭavahniṃ samadanti gṛdhrāḥ|| 16

अर्थ

दया, लज्जा, लक्ष्मी और कीर्ति तुझे छोड़ चुकी है। तूने ऐसे-ऐसे नीच कर्म किये हैं, जिनकी निन्दा मनुष्योंकी तो बात ही क्या—राक्षसतक करते हैं। आज मेरे त्रिशूलसे तेरा शरीर टूक-टूक हो जायगा। बड़े कष्टसे तेरी मृत्यु होगी। तेरे-जैसे पापीको आग भी नहीं जलायेगी, तुझे तो गीध नोंच-नोंचकर खायेंगे॥ १६॥

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