वृत्रासुरने देखा कि समयकी अनुकूलताके कारण देवतालोग असुरोंकी सेनाको खदेड़ रहे हैं और वह इस प्रकार छिन्न-भिन्न हो रही है, मानो बिना नायककी हो॥ २॥
विशीर्यमाणां पृतनामासुरीमसुरर्षभः।
कालानुकूलैस्त्रिदशैः काल्यमानामनाथवत्॥ २
वृत्रासुरने देखा कि समयकी अनुकूलताके कारण देवतालोग असुरोंकी सेनाको खदेड़ रहे हैं और वह इस प्रकार छिन्न-भिन्न हो रही है, मानो बिना नायककी हो॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.11.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 757) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/11/2/