श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.11.21

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

अहं समाधाय मनो यथाऽऽह

सङ्कर्षणस्तच्चरणारविन्दे ।

त्वद्वज्ररंहोलुलितग्राम्यपाशो

गतिं मुनेर्याम्यपविद्धलोकः॥ २१

ahaṃ samādhāya mano yathā''ha

saṅkarṣaṇastaccaraṇāravinde |

tvadvajraraṃholulitagrāmyapāśo

gatiṃ muneryāmyapaviddhalokaḥ|| 21

अर्थ

देवराज! भगवान् संकर्षणके आज्ञानुसार मैं अपने मनको उनके चरणकमलोंमें लीन कर दूँगा। तेरे वज्रका वेग मुझे नहीं, मेरे विषय-भोगरूप फंदेको काट डालेगा और मैं शरीर त्यागकर मुनिजनोचित गति प्राप्त करूँगा॥ २१॥✎ 527 528

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #527 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #528 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् ने → विष्णुभगवान्‌ने

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