श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.11.24

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

अहं हरे तव पादैकमूल-

दासानुदासो भवितास्मि भूयः।

मनः स्मरेतासुपतेर्गुणांस्ते

गृणीत वाक् कर्म करोतु कायः॥ २४

ahaṃ hare tava pādaikamūla-

dāsānudāso bhavitāsmi bhūyaḥ|

manaḥ smaretāsupaterguṇāṃste

gṛṇīta vāk karma karotu kāyaḥ|| 24

अर्थ

(भगवान्‌को प्रत्यक्ष अनुभव करते हुए वृत्रासुरने प्रार्थना की—) ‘प्रभो! आप मुझपर ऐसी कृपा कीजिये कि अनन्यभावसे आपके चरणकमलोंके आश्रित सेवकोंकी सेवा करनेका अवसर मुझे अगले जन्ममें भी प्राप्त हो। प्राणवल्लभ! मेरा मन आपके मंगलमय गुणोंका स्मरण करता रहे, मेरी वाणी उन्हींका गान करे और शरीर आपकी सेवामें ही संलग्न रहे॥ २४॥✎ 530

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #530 शब्दोंके बीचका स्थान: (भगवान् को → (भगवान्‌को

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