श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.12.5

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

वृत्रस्य कर्मातिमहाद्भुतं तत्

सुरासुराश्चारणसिद्धसङ्घाः ।

अपूजयंस्तत् पुरुहूतसंकटं

निरीक्ष्य हा हेति विचुक्रुशुर्भृशम्॥ ५

vṛtrasya karmātimahādbhutaṃ tat

surāsurāścāraṇasiddhasaṅghāḥ |

apūjayaṃstat puruhūtasaṃkaṭaṃ

nirīkṣya hā heti vicukruśurbhṛśam|| 5

अर्थ

वृत्रासुरके इस अत्यन्त अलौकिक कार्यको देखकर देवता, असुर, चारण, सिद्धगण आदि सभी प्रशंसा करने लगे। परन्तु इन्द्रका संकट देखकर वे ही लोग बार-बार ‘हाय-हाय!’ कहकर चिल्लाने लगे॥ ५॥

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