श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.13.15

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

स आवसत्पुष्करनालतन्तू-

नलब्धभोगो यदिहाग्‍निदूतः।

वर्षाणि साहस्रमलक्षितोऽन्तः

स चिन्तयन् ब्रह्मवधाद् विमोक्षम्॥ १५

sa āvasatpuṣkaranālatantū-

nalabdhabhogo yadihāgnidūtaḥ|

varṣāṇi sāhasramalakṣito'ntaḥ

sa cintayan brahmavadhād vimokṣam|| 15

अर्थ

देवराज इन्द्र मानसरोवरके कमलनालके तन्तुओंमें एक हजार वर्षोंतक छिपकर निवास करते रहे और सोचते रहे कि ब्रह्महत्यासे मेरा छुटकारा कैसे होगा। इतने दिनोंतक उन्हें भोजनके लिये किसी प्रकारकी सामग्री न मिल सकी। क्योंकि वे अग्‍निदेवताके मुखसे भोजन करते हैं और अग्‍निदेवता जलके भीतर कमलतन्तुओंमें जा नहीं सकते थे॥ १५॥

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