श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.14.3

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

रजोभिः समसंख्याताः पार्थिवैरिह जन्तवः।

तेषां ये केचनेहन्ते श्रेयो वै मनुजादयः॥ ३

rajobhiḥ samasaṃkhyātāḥ pārthivairiha jantavaḥ|

teṣāṃ ye kecanehante śreyo vai manujādayaḥ|| 3

अर्थ

भगवन्! इस जगत‍्के प्राणी पृथ्वीके धूलिकणोंके समान ही असंख्य हैं। उनमेंसे कुछ मनुष्य आदि श्रेष्ठ जीव ही अपने कल्याणकी चेष्टा करते हैं॥ ३॥✎ 538 539

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #538 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #539 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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