श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.14.41

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

दासीनां को नु सन्तापः स्वामिनः परिचर्यया।

अभीक्ष्णं लब्धमानानां दास्या दासीव दुर्भगाः॥ ४१

dāsīnāṃ ko nu santāpaḥ svāminaḥ paricaryayā|

abhīkṣṇaṃ labdhamānānāṃ dāsyā dāsīva durbhagāḥ|| 41

अर्थ

भला, दासियोंको क्या दुःख है? वे तो अपने स्वामीकी सेवा करके निरन्तर सम्मान पाती रहती हैं। परन्तु हम अभागिनी तो इस समय उनसे भी गयी-बीती हो रही हैं और दासियोंकी दासीके समान बार-बार तिरस्कार पा रही हैं॥ ४१॥✎ 540

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #540 शब्दोंके बीचका स्थान: है,धायसे → है, धायसे

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