श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.14.46

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

सा शयानमुपव्रज्य दृष्ट्वा चोत्तारलोचनम्।

प्राणेन्द्रियात्मभिस्त्यक्तं हतास्मीत्यपतद्भुवि॥ ४६

sā śayānamupavrajya dṛṣṭvā cottāralocanam|

prāṇendriyātmabhistyaktaṃ hatāsmītyapatadbhuvi|| 46

अर्थ

धायने सोते हुए बालकके पास जाकर देखा कि उसके नेत्रोंकी पुतलियाँ उलट गयी हैं। प्राण, इन्द्रिय और जीवात्माने भी उसके शरीरसे विदा ले ली है। यह देखते ही ‘हाय रे! मैं मारी गयी!’ इस प्रकार कहकर वह धरतीपर गिर पड़ी॥ ४६॥✎ 540

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #540 शब्दोंके बीचका स्थान: है,धायसे → है, धायसे

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