श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.14.54

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अहो विधातस्त्वमतीव बालिशो

यस्त्वात्मसृष्ट्यप्रतिरूपमीहसे ।

परेऽनुजीवत्यपरस्य या मृति-

र्विपर्ययश्चेत्त्वमसि ध्रुवः परः॥ ५४

aho vidhātastvamatīva bāliśo

yastvātmasṛṣṭyapratirūpamīhase |

pare'nujīvatyaparasya yā mṛti-

rviparyayaścettvamasi dhruvaḥ paraḥ|| 54

अर्थ

वे कहने लगीं—‘अरे विधाता! सचमुच तू बड़ा मूर्ख है, जो अपनी सृष्टिके प्रतिकूल चेष्टा करता है। बड़े आश्‍चर्यकी बात है कि बूढ़े-बूढ़े तो जीते रहें और बालक मर जायँ। यदि वास्तवमें तेरे स्वभावमें ऐसी ही विपरीतता है, तब तो तू जीवोंका अमर शत्रु है॥ ५४॥

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