॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.14.56
त्वं तात नार्हसि च मां कृपणामनाथां
त्यक्तुं विचक्ष्व पितरं तव शोकतप्तम्।
अञ्जस्तरेम भवताप्रजदुस्तरं यद्
ध्वान्तं न याह्यकरुणेन यमेन दूरम्॥ ५६
tvaṃ tāta nārhasi ca māṃ kṛpaṇāmanāthāṃ
tyaktuṃ vicakṣva pitaraṃ tava śokataptam|
añjastarema bhavatāprajadustaraṃ yad
dhvāntaṃ na yāhyakaruṇena yamena dūram|| 56
अर्थ
फिर वे अपने मृत पुत्रकी ओर देखकर कहने लगीं—‘बेटा! मैं तुम्हारे बिना अनाथ और दीन हो रही हूँ। मुझे छोड़कर इस प्रकार चले जाना तुम्हारे लिये उचित नहीं है। तनिक आँख खोलकर देखो तो सही, तुम्हारे पिताजी तुम्हारे वियोगमें कितने शोक-सन्तप्त हो रहे हैं। बेटा! जिस घोर नरकको निःसन्तान पुरुष बड़ी कठिनाईसे पार कर पाते हैं, उसे हम तुम्हारे सहारे अनायास ही पार कर लेंगे। अरे बेटा! तुम इस यमराजके साथ दूर मत जाओ। यह तो बड़ा ही निर्दयी है॥ ५६॥