राजन्! महर्षि अंगिरा और देवर्षि नारदने देखा कि राजा चित्रकेतु पुत्रशोकके कारण चेतनाहीन हो रहे हैं, यहाँतक कि उन्हें समझानेवाला भी कोई नहीं है। तब वे दोनों वहाँ आये॥ ६१॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे चित्रकेतुविलापो नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥
एवं कश्मलमापन्नं नष्टसंज्ञमनायकम्।
ज्ञात्वाङ्गिरा नाम मुनिराजगाम सनारदः॥ ६१
राजन्! महर्षि अंगिरा और देवर्षि नारदने देखा कि राजा चित्रकेतु पुत्रशोकके कारण चेतनाहीन हो रहे हैं, यहाँतक कि उन्हें समझानेवाला भी कोई नहीं है। तब वे दोनों वहाँ आये॥ ६१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.14.61 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 775) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/14/61/