श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.15.18

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

इत्थं त्वां पुत्रशोकेन मग्नं तमसि दुस्तरे।

अतदर्हमनुस्मृत्य महापुरुषगोचरम्॥ १८

itthaṃ tvāṃ putraśokena magnaṃ tamasi dustare|

atadarhamanusmṛtya mahāpuruṣagocaram|| 18

अर्थ

जब हमलोगोंने देखा कि तुम पुत्रशोकके कारण बहुत ही घने अज्ञानान्धकारमें डूब रहे हो, तब सोचा कि तुम भगवान्‌के भक्त हो, शोक करनेयोग्य नहीं हो। अतः तुमपर अनुग्रह करनेके लिये ही हम दोनों यहाँ आये हैं। राजन्! सच्ची बात तो यह है कि जो भगवान् और ब्राह्मणोंका भक्त है, उसे किसी अवस्थामें शोक नहीं करना चाहिये॥ १८-१९॥

यह अर्थ श्लोक 18–19 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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