परीक्षित्! इस प्रकार अंगिरा और नारदजीके उपदेशसे विवेकबुद्धि जाग्रत् हो जानेके कारण राजा चित्रकेतु घर-गृहस्थीके अँधेरे कुएँसे उसी प्रकार बाहर निकल पड़े, जैसे कोई हाथी तालाबके कीचड़से निकल आये॥ १५॥
स इत्थं प्रतिबुद्धात्मा चित्रकेतुर्द्विजोक्तिभिः।
गृहान्धकूपान्निष्क्रान्तः सरःपङ्कादिव द्विपः॥ १५
परीक्षित्! इस प्रकार अंगिरा और नारदजीके उपदेशसे विवेकबुद्धि जाग्रत् हो जानेके कारण राजा चित्रकेतु घर-गृहस्थीके अँधेरे कुएँसे उसी प्रकार बाहर निकल पड़े, जैसे कोई हाथी तालाबके कीचड़से निकल आये॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.16.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 780) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/16/15/