श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.20

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

आत्मानन्दानुभूत्यैव न्यस्तशक्त्यूर्मये नमः।

हृषीकेशाय महते नमस्ते विश्‍वमूर्तये॥ २०

ātmānandānubhūtyaiva nyastaśaktyūrmaye namaḥ|

hṛṣīkeśāya mahate namaste viśvamūrtaye|| 20

अर्थ

अपने स्वरूपभूत आनन्दकी अनुभूतिसे ही आपने मायाजनित राग-द्वेष आदि दोषोंका तिरस्कार कर रखा है। मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप सबकी समस्त इन्द्रियोंके प्रेरक, परम महान् और विराट्स्वरूप हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ २०॥

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