भगवन्! आपने जिस दृष्टिसे भागवतधर्मका निरूपण किया है, वह कभी परमार्थसे विचलित नहीं होती। इसलिये जो संत पुरुष चर-अचर समस्त प्राणियोंमें समदृष्टि रखते हैं, वे ही उसका सेवन करते हैं॥ ४३॥✎ 543
न व्यभिचरति तवेक्षा
यया ह्यभिहितो भागवतो धर्मः।
स्थिरचरसत्त्वकदम्बे-
ष्वपृथग्धियो यमुपासते त्वार्याः॥ ४३
भगवन्! आपने जिस दृष्टिसे भागवतधर्मका निरूपण किया है, वह कभी परमार्थसे विचलित नहीं होती। इसलिये जो संत पुरुष चर-अचर समस्त प्राणियोंमें समदृष्टि रखते हैं, वे ही उसका सेवन करते हैं॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.16.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 784) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/16/43/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)