॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.17.3
कुलाचलेन्द्रद्रोणीषु नानासङ्कल्पसिद्धिषु।
रेमे विद्याधरस्त्रीभिर्गापयन् हरिमीश्वरम्॥ ३
kulācalendradroṇīṣu nānāsaṅkalpasiddhiṣu|
reme vidyādharastrībhirgāpayan harimīśvaram|| 3
अर्थ
महायोगी चित्रकेतु करोड़ों वर्षोंतक सब प्रकारके संकल्पोंको पूर्ण करनेवाली सुमेरु पर्वतकी घाटियोंमें विहार करते रहे। उनके शरीरका बल और इन्द्रियोंकी शक्ति अक्षुण्ण रही। बड़े-बड़े मुनि, सिद्ध, चारण उनकी स्तुति करते रहते। उनकी प्रेरणासे विद्याधरोंकी स्त्रियाँ उनके पास सर्वशक्तिमान् भगवान्के गुण और लीलाओंका गान करती रहतीं॥ २-३॥