श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.17.31

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

वासुदेवे भगवति भक्तिमुद्वहतां नृणाम्।

ज्ञानवैराग्यवीर्याणां नेह कश्चिद् व्यपाश्रयः॥ ३१

vāsudeve bhagavati bhaktimudvahatāṃ nṛṇām|

jñānavairāgyavīryāṇāṃ neha kaścid vyapāśrayaḥ|| 31

अर्थ

जिनके पास ज्ञान और वैराग्यका बल है और जो भगवान् वासुदेवके चरणोंमें भक्तिभाव रखते हैं, उनके लिये इस जगत‍्में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जिसे वे हेय या उपादेय समझकर राग-द्वेष करें॥ ३१॥✎ 546 547 548

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #546 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #547 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #548 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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