भगवान्के परमप्रेमी भक्त चित्रकेतु भी भगवती पार्वतीको बदलेमें शाप दे सकते थे, परन्तु उन्होंने उन्हें शाप न देकर उनका शाप सिर चढ़ा लिया! यही साधु पुरुषका लक्षण है॥ ३७॥
इति भागवतो देव्याः प्रतिशप्तुमलन्तमः।
मूर्ध्ना सञ्जगृहे शापमेतावत्साधुलक्षणम्॥ ३७
भगवान्के परमप्रेमी भक्त चित्रकेतु भी भगवती पार्वतीको बदलेमें शाप दे सकते थे, परन्तु उन्होंने उन्हें शाप न देकर उनका शाप सिर चढ़ा लिया! यही साधु पुरुषका लक्षण है॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.17.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 791) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/17/37/