श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.26

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

आशासानस्य तस्येदं ध्रुवमुन्‍नद्धचेतसः।

मदशोषक इन्द्रस्य भूयाद्येन सुतो हि मे॥ २६

āśāsānasya tasyedaṃ dhruvamunnaddhacetasaḥ|

madaśoṣaka indrasya bhūyādyena suto hi me|| 26

अर्थ

मैं समझती हूँ इन्द्र अपने शरीरको नित्य मानकर मतवाला हो रहा है। उसे अपने विनाशका पता ही नहीं है। अब मैं वह उपाय करूँगी, जिससे मुझे ऐसा पुत्र प्राप्त हो, जो इन्द्रका घमण्ड चूर-चूर कर दे’॥ २६॥

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