श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.39

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

अहो अद्येन्द्रियारामो योषिन्मय्येह मायया।

गृहीतचेताः कृपणः पतिष्ये नरके ध्रुवम्॥ ३९

aho adyendriyārāmo yoṣinmayyeha māyayā|

gṛhītacetāḥ kṛpaṇaḥ patiṣye narake dhruvam|| 39

अर्थ

देखो तो सही, अब मैं इन्द्रियोंके विषयोंमें सुख मानने लगा हूँ। स्त्रीरूपिणी मायाने मेरे चित्तको अपने वशमें कर लिया है। हाय! हाय! आज मैं कितनी दीन-हीन अवस्थामें हूँ। अवश्य ही अब मुझे नरकमें गिरना पड़ेगा॥ ३९॥

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