॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.18.41
शरत्पद्मोत्सवं वक्त्रं वचश्च श्रवणामृतम्।
हृदयं क्षुरधाराभं स्त्रीणां को वेद चेष्टितम्॥ ४१
śaratpadmotsavaṃ vaktraṃ vacaśca śravaṇāmṛtam|
hṛdayaṃ kṣuradhārābhaṃ strīṇāṃ ko veda ceṣṭitam|| 41
अर्थ
सच है, स्त्रियोंके चरित्रको कौन जानता है। इनका मुँह तो ऐसा होता है जैसे शरद्ऋतुका खिला हुआ कमल। बातें सुननेमें ऐसी मीठी होती हैं, मानो अमृत घोल रखा हो। परन्तु हृदय, वह तो इतना तीखा होता है कि मानो छुरेकी पैनी धार हो॥ ४१॥