श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.43

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

प्रतिश्रुतं ददामीति वचस्तन्‍न मृषा भवेत्।

वधं नार्हति चेन्द्रोऽपि तत्रेदमुपकल्पते॥ ४३

pratiśrutaṃ dadāmīti vacastanna mṛṣā bhavet|

vadhaṃ nārhati cendro'pi tatredamupakalpate|| 43

अर्थ

अब तो मैं कह चुका हूँ कि जो तुम माँगोगी, दूँगा। मेरी बात झूठी नहीं होनी चाहिये। परन्तु इन्द्र भी वध करनेयोग्य नहीं है। अच्छा, अब इस विषयमें मैं यह युक्ति करता हूँ’॥ ४३॥

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