श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.47

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

कश्यप उवाच

न हिंस्याद‍्भूतजातानि न शपेन्‍नानृतं वदेत्।

नच्छिन्द्यान्‍नखरोमाणि न स्पृशेद्यदमङ्गलम्॥ ४७

na hiṃsyādbhūtajātāni na śapennānṛtaṃ vadet|

nacchindyānnakharomāṇi na spṛśedyadamaṅgalam|| 47

अर्थ

कश्यपजीने उत्तर दिया—प्रिये! इस व्रतमें किसी भी प्राणीको मन, वाणी या क्रियाके द्वारा सताये नहीं, किसीको शाप या गाली न दे, झूठ न बोले, शरीरके नख और रोएँ न काटे और किसी भी अशुभ वस्तुका स्पर्श न करे॥ ४७॥

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