श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.74

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

आराधनं भगवत ईहमाना निराशिषः।

ये तु नेच्छन्त्यपि परं ते स्वार्थकुशलाः स्मृताः॥ ७४

ārādhanaṃ bhagavata īhamānā nirāśiṣaḥ|

ye tu necchantyapi paraṃ te svārthakuśalāḥ smṛtāḥ|| 74

अर्थ

जो लोग निष्कामभावसे भगवान्‌की आराधना करते हैं और दूसरी वस्तुओंकी तो बात ही क्या, मोक्षकी भी इच्छा नहीं करते, वे ही अपने स्वार्थ और परमार्थमें निपुण हैं॥ ७४॥✎ 554 555

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #554 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #555 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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