श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.19.13

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

गुणव्यक्तिरियं देवी व्यञ्जको गुणभुग्भवान्।

त्वं हि सर्वशरीर्यात्मा श्रीः शरीरेन्द्रियाशया।

नामरूपे भगवती प्रत्ययस्त्वमपाश्रयः॥ १३

guṇavyaktiriyaṃ devī vyañjako guṇabhugbhavān|

tvaṃ hi sarvaśarīryātmā śrīḥ śarīrendriyāśayā|

nāmarūpe bhagavatī pratyayastvamapāśrayaḥ|| 13

अर्थ

माता लक्ष्मीजी तीनों गुणोंकी अभिव्यक्ति हैं और आप उन्हें व्यक्त करनेवाले और उनके भोक्ता हैं। आप समस्त प्राणियोंके आत्मा हैं और लक्ष्मीजी शरीर, इन्द्रिय और अन्तःकरण हैं। माता लक्ष्मीजी नाम एवं रूप हैं और आप नाम-रूप दोनोंके प्रकाशक तथा आधार हैं॥ १३॥

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