श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.19.26

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

कन्या च विन्देत समग्रलक्षणं

वरं त्ववीरा हतकिल्बिषा गतिम्।

मृतप्रजा जीवसुता धनेश्‍वरी

सुदुर्भगा सुभगा रूपमग्र्यम्॥ २६

kanyā ca vindeta samagralakṣaṇaṃ

varaṃ tvavīrā hatakilbiṣā gatim|

mṛtaprajā jīvasutā dhaneśvarī

sudurbhagā subhagā rūpamagryam|| 26

अर्थ

इस व्रतका अनुष्ठान करनेवाली कन्या समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त पति प्राप्त करती है और विधवा इस व्रतसे निष्पाप होकर वैकुण्ठमें जाती है। जिसके बच्चे मर जाते हों, वह स्त्री इसके प्रभावसे चिरायु पुत्र प्राप्त करती है। धनवती किन्तु अभागिनी स्त्रीको सौभाग्य प्राप्त होता है और कुरूपाको श्रेष्ठ रूप मिल जाता है। रोगी इस व्रतके प्रभावसे रोगमुक्त होकर बलिष्ठ शरीर और श्रेष्ठ इन्द्रियशक्ति प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य मांगलिक श्राद्धकर्मोंमें इसका पाठ करता है, उसके पितर और देवता अनन्त तृप्ति लाभ करते हैं॥ २६-२७॥

यह अर्थ श्लोक 26–27 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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