श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.19.28

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

तुष्टाः प्रयच्छन्ति समस्तकामान्

होमावसाने हुतभुक् श्रीर्हरिश्‍च।

राजन् महन्मरुतां जन्म पुण्यं

दितेर्व्रतं चाभिहितं महत्ते॥ २८

tuṣṭāḥ prayacchanti samastakāmān

homāvasāne hutabhuk śrīrhariśca|

rājan mahanmarutāṃ janma puṇyaṃ

ditervrataṃ cābhihitaṃ mahatte|| 28

अर्थ

वे सन्तुष्ट होकर हवनके समाप्त होनेपर व्रतीकी समस्त इच्छाएँ पूर्ण कर देते हैं। ये सब तो सन्तुष्ट होते ही हैं, समस्त यज्ञोंके एकमात्र भोक्ता भगवान् लक्ष्मीनारायण भी सन्तुष्ट हो जाते हैं और व्रतीकी समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण कर देते हैं। परीक्षित्! मैंने तुम्हें मरुद्गणकी आदरणीय और पुण्यप्रद जन्म-कथा सुनायी और साथ ही दितिके श्रेष्ठ पुंसवन-व्रतका वर्णन भी सुना दिया॥ २८॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्र्यां पारमहंस्यां संहितायां
षष्ठस्कन्धे पुंसवनव्रतकथनं नामैकोनविंशोऽध्यायः
॥ १९॥

इति षष्ठः स्कन्धः समाप्तः।

॥ हरिः ॐ तत्सत्॥

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