श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.2.12

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

नैकान्तिकं तद्धि कृतेऽपि निष्कृते

मनः पुनर्धावति चेदसत्पथे।

तत्कर्मनिर्हारमभीप्सतां हरे-

र्गुणानुवादः खलु सत्त्वभावनः॥ १२

naikāntikaṃ taddhi kṛte'pi niṣkṛte

manaḥ punardhāvati cedasatpathe|

tatkarmanirhāramabhīpsatāṃ hare-

rguṇānuvādaḥ khalu sattvabhāvanaḥ|| 12

अर्थ

यदि प्रायश्चित्त करनेके बाद भी मन फिरसे कुमार्गमें—पापकी ओर दौड़े, तो वह चरम सीमाका—पूरा-पूरा प्रायश्चित्त नहीं है। इसलिये जो लोग ऐसा प्रायश्चित्त करना चाहें कि जिससे पापकर्मों और वासनाओंकी जड़ ही उखड़ जाय, उन्हें भगवान्‌के गुणोंका ही गान करना चाहिये; क्योंकि उससे चित्त सर्वथा शुद्ध हो जाता है॥ १२॥

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