भगवान्के पार्षदोंने कहा—यमदूतो! यह बड़े आश्चर्य और खेदकी बात है कि धर्मज्ञोंकी सभामें अधर्म प्रवेश कर रहा है, क्योंकि वहाँ निरपराध और अदण्डनीय व्यक्तियोंको व्यर्थ ही दण्ड दिया जाता है॥ २॥
अहो कष्टं धर्मदृशामधर्मः स्पृशते सभाम्।
यत्रादण्ड्येष्वपापेषु दण्डो यैर्ध्रियते वृथा॥ २
भगवान्के पार्षदोंने कहा—यमदूतो! यह बड़े आश्चर्य और खेदकी बात है कि धर्मज्ञोंकी सभामें अधर्म प्रवेश कर रहा है, क्योंकि वहाँ निरपराध और अदण्डनीय व्यक्तियोंको व्यर्थ ही दण्ड दिया जाता है॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.2.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 703) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/2/2/