मैं अब अवश्य ही अत्यन्त भयावने नरकमें गिरूँगा, जिसमें गिरकर धर्मघाती पापात्मा कामी पुरुष अनेकों प्रकारकी यमयातना भोगते हैं॥ २९॥✎ 497
सोऽहं व्यक्तं पतिष्यामि नरके भृशदारुणे।
धर्मघ्नाः कामिनो यत्र विन्दन्ति यमयातनाः॥ २९
मैं अब अवश्य ही अत्यन्त भयावने नरकमें गिरूँगा, जिसमें गिरकर धर्मघाती पापात्मा कामी पुरुष अनेकों प्रकारकी यमयातना भोगते हैं॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.2.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 709) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/2/29/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)