श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.3.15

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

अन्ये च ये विश्‍वसृजोऽमरेशा

भृग्वादयोऽस्पृष्टरजस्तमस्काः ।

यस्येहितं न विदुः स्पृष्टमायाः

सत्त्वप्रधाना अपि किं ततोऽन्ये॥ १५

anye ca ye viśvasṛjo'mareśā

bhṛgvādayo'spṛṣṭarajastamaskāḥ |

yasyehitaṃ na viduḥ spṛṣṭamāyāḥ

sattvapradhānā api kiṃ tato'nye|| 15

अर्थ

दूतो! मैं, इन्द्र, निर्ऋति, वरुण, चन्द्रमा, अग्‍नि, शंकर, वायु, सूर्य, ब्रह्मा, बारहों आदित्य, विश्वेदेवता, आठों वसु, साध्य, उनचास मरुत्, सिद्ध, ग्यारहों रुद्र, रजोगुण एवं तमोगुणसे रहित भृगु आदि प्रजापति और बड़े-बड़े देवता—सब-के-सब सत्त्वप्रधान होनेपर भी उनकी मायाके अधीन हैं तथा भगवान् कब क्या किस रूपमें करना चाहते हैं—इस बातको नहीं जानते। तब दूसरोंकी तो बात ही क्या है॥ १४-१५॥✎ 500 1362 1363

यह अर्थ श्लोक 14–15 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #500 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #1362 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति, → निऋर्ऋति,
  • #1363 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति, → निर्ऋति,

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