श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.3.32

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

शृण्वतां गृणतां वीर्याण्युद्दामानि हरेर्मुहुः।

यथा सुजातया भक्‍त्या शुद्ध्येन्‍नात्मा व्रतादिभिः॥ ३२

śṛṇvatāṃ gṛṇatāṃ vīryāṇyuddāmāni harermuhuḥ|

yathā sujātayā bhaktyā śuddhyennātmā vratādibhiḥ|| 32

अर्थ

जो लोग बार-बार भगवान्‌के उदार और कृपापूर्ण चरित्रोंका श्रवण-कीर्तन करते हैं, उनके हृदयमें प्रेममयी भक्तिका उदय हो जाता है। उस भक्तिसे जैसी आत्मशुद्धि होती है, वैसी कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि व्रतोंसे नहीं होती॥ ३२॥

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