॥ श्रीहरिः ॥
आतिष्ठत सतां मार्गं कोपं यच्छत दीपितम्।
पित्रा पितामहेनापि जुष्टं वः प्रपितामहैः॥ ११
ātiṣṭhata satāṃ mārgaṃ kopaṃ yacchata dīpitam|
pitrā pitāmahenāpi juṣṭaṃ vaḥ prapitāmahaiḥ|| 11
अर्थ
आपलोग अपना क्रोध शान्त करें और अपने पिता, पितामह, प्रपितामह आदिके द्वारा सेवित सत्पुरुषोंके मार्गका अनुसरण करें॥ ११॥✎ 507 508
आतिष्ठत सतां मार्गं कोपं यच्छत दीपितम्।
पित्रा पितामहेनापि जुष्टं वः प्रपितामहैः॥ ११
आपलोग अपना क्रोध शान्त करें और अपने पिता, पितामह, प्रपितामह आदिके द्वारा सेवित सत्पुरुषोंके मार्गका अनुसरण करें॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.4.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 718) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/4/11/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
- #507 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्को
- #508 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्ने