श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.11

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

आतिष्ठत सतां मार्गं कोपं यच्छत दीपितम्।

पित्रा पितामहेनापि जुष्टं वः प्रपितामहैः॥ ११

ātiṣṭhata satāṃ mārgaṃ kopaṃ yacchata dīpitam|

pitrā pitāmahenāpi juṣṭaṃ vaḥ prapitāmahaiḥ|| 11

अर्थ

आपलोग अपना क्रोध शान्त करें और अपने पिता, पितामह, प्रपितामह आदिके द्वारा सेवित सत्पुरुषोंके मार्गका अनुसरण करें॥ ११॥✎ 507 508

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #507 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #508 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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