श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.24

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

न यस्य सख्यं पुरुषोऽवैति सख्युः

सखा वसन् संवसतः पुरेऽस्मिन्।

गुणो यथा गुणिनो व्यक्तदृष्टे-

स्तस्मै महेशाय नमस्करोमि॥ २४

na yasya sakhyaṃ puruṣo'vaiti sakhyuḥ

sakhā vasan saṃvasataḥ pure'smin|

guṇo yathā guṇino vyaktadṛṣṭe-

stasmai maheśāya namaskaromi|| 24

अर्थ

यों तो जीव और ईश्‍वर एक-दूसरेके सखा हैं तथा इसी शरीरमें इकट्ठे ही निवास करते हैं; परन्तु जीव सर्वशक्तिमान् आपके सख्यभावको नहीं जानता—ठीक वैसे ही, जैसे रूप, रस, गन्ध आदि विषय अपने प्रकाशित करनेवाली नेत्र, घ्राण आदि इन्द्रियवृत्तियोंको नहीं जानते। क्योंकि आप जीव और जगत‍्के द्रष्टा हैं, दृश्य नहीं। महेश्‍वर! मैं आपके श्रीचरणोंमें नमस्कार करता हूँ॥ २४॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें