श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.27

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

मनीषिणोऽन्तर्हृदि संनिवेशितं

स्वशक्तिभिर्नवभिश्‍च त्रिवृद्भिः।

वह्निं यथा दारुणि पाञ्चदश्यं

मनीषया निष्कर्षन्ति गूढम्॥ २७

manīṣiṇo'ntarhṛdi saṃniveśitaṃ

svaśaktibhirnavabhiśca trivṛdbhiḥ|

vahniṃ yathā dāruṇi pāñcadaśyaṃ

manīṣayā niṣkarṣanti gūḍham|| 27

अर्थ

जैसे याज्ञिक लोग काष्ठमें छिपे हुए अग्‍निको ‘सामिधेनी’ नामके पन्द्रह मन्त्रोंके द्वारा प्रकट करते हैं, वैसे ही ज्ञानी पुरुष अपनी सत्ताईस शक्तियोंके भीतर गूढभावसे छिपे हुए आपको अपनी शुद्ध बुद्धिके द्वारा हृदयमें ही ढूँढ़ निकालते हैं॥ २७॥

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