॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.4.29
यद्यन्निरुक्तं वचसा निरूपितं
धियाक्षभिर्वा मनसा वोत यस्य।
मा भूत् स्वरूपं गुणरूपं हि तत्तत्
स वै गुणापायविसर्गलक्षणः॥ २९
yadyanniruktaṃ vacasā nirūpitaṃ
dhiyākṣabhirvā manasā vota yasya|
mā bhūt svarūpaṃ guṇarūpaṃ hi tattat
sa vai guṇāpāyavisargalakṣaṇaḥ|| 29
अर्थ
प्रभो! जो कुछ वाणीसे कहा जाता है अथवा जो कुछ मन, बुद्धि और इन्द्रियोंसे ग्रहण किया जाता है, वह आपका स्वरूप नहीं है; क्योंकि वह तो गुणरूप है और आप गुणोंकी उत्पत्ति और प्रलयके अधिष्ठान हैं। आपमें केवल उनकी प्रतीतिमात्र है॥ २९॥