॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.4.39
त्रैलोक्यमोहनं रूपं बिभ्रत् त्रिभुवनेश्वरः।
वृतो नारदनन्दाद्यैः पार्षदैः सुरयूथपैः॥ ३९
trailokyamohanaṃ rūpaṃ bibhrat tribhuvaneśvaraḥ|
vṛto nāradanandādyaiḥ pārṣadaiḥ surayūthapaiḥ|| 39
अर्थ
त्रिभुवनपति भगवान्ने त्रैलोक्यविमोहन रूप धारण कर रखा था। नारद, नन्द, सुनन्द आदि पार्षद उनके चारों ओर खड़े थे। इन्द्र आदि देवेश्वरगण स्तुति कर रहे थे तथा सिद्ध, गन्धर्व और चारण भगवान्के गुणोंका गान कर रहे थे। यह अत्यन्त आश्चर्यमय और अलौकिक रूप देखकर दक्षप्रजापति कुछ सहम गये॥ ३९-४०॥✎ 511