श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.43

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

प्राचेतस महाभाग संसिद्धस्तपसा भवान्।

यच्छ्रद्धया मत्परया मयि भावं परं गतः॥ ४३

prācetasa mahābhāga saṃsiddhastapasā bhavān|

yacchraddhayā matparayā mayi bhāvaṃ paraṃ gataḥ|| 43

अर्थ

श्रीभगवान्‌ने कहा—परम भाग्यवान् दक्ष! अब तुम्हारी तपस्या सिद्ध हो गयी, क्योंकि मुझपर श्रद्धा करनेसे तुम्हारे हृदयमें मेरे प्रति परम प्रेमभावका उदय हो गया है॥ ४३॥✎ 512

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #512 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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