‘(देवर्षि नारदका कहना तो सच है) यह लिंगशरीर ही जिसे साधारणतः जीव कहते हैं, पृथ्वी है और यही आत्माका अनादि बन्धन है। इसका अन्त (विनाश) देखे बिना मोक्षके अनुपयोगी कर्मोंमें लगे रहनेसे क्या लाभ है?॥ ११॥
भूः क्षेत्रं जीवसंज्ञं यदनादि निजबन्धनम्।
अदृष्ट्वा तस्य निर्वाणं किमसत्कर्मभिर्भवेत्॥ ११
‘(देवर्षि नारदका कहना तो सच है) यह लिंगशरीर ही जिसे साधारणतः जीव कहते हैं, पृथ्वी है और यही आत्माका अनादि बन्धन है। इसका अन्त (विनाश) देखे बिना मोक्षके अनुपयोगी कर्मोंमें लगे रहनेसे क्या लाभ है?॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.5.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 725) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/5/11/