श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.5.13

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

पुमान् नैवैति यद् गत्वा बिलस्वर्गं३ गतो यथा।

प्रत्यग्धामाविद इह किमसत्कर्मभिर्भवेत्॥ १३

pumān naivaiti yad gatvā bilasvargaṃ gato yathā|

pratyagdhāmāvida iha kimasatkarmabhirbhavet|| 13

अर्थ

जैसे मनुष्य बिलरूप पातालमें प्रवेश करके वहाँसे नहीं लौट पाता—वैसे ही जीव जिसको प्राप्त होकर फिर संसारमें नहीं लौटता, जो स्वयं अन्तर्ज्योतिःस्वरूप है, उस परमात्माको जाने बिना विनाशवान् स्वर्ग आदि फल देनेवाले कर्मोंको करनेसे क्या लाभ है?॥ १३॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—बिलं सर्गं।

    (मुद्रित पृष्ठ 725)

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