श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.5.16

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

सृष्ट्यप्ययकरीं मायां वेलाकूलान्तवेगिताम्।

मत्तस्य तामविज्ञस्य१ किमसत्कर्मभिर्भवेत्॥ १६

sṛṣṭyapyayakarīṃ māyāṃ velākūlāntavegitām|

mattasya tāmavijñasya kimasatkarmabhirbhavet|| 16

अर्थ

माया ही दोनों ओर बहनेवाली नदी है। यह सृष्टि भी करती है और प्रलय भी। जो लोग इससे निकलनेके लिये तपस्या, विद्या आदि तटका सहारा लेने लगते हैं, उन्हें रोकनेके लिये क्रोध, अहंकार आदिके रूपमें वह और भी वेगसे बहने लगती है। जो पुरुष उसके वेगसे विवश एवं अनभिज्ञ है, वह मायिक कर्मोंसे क्या लाभ उठावेगा?॥ १६॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—तदविज्ञस्य।

    (मुद्रित पृष्ठ 726)

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