श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.5.18

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

ऐश्‍वरं शास्त्रमुत्सृज्य बन्धमोक्षानुदर्शनम्।

विविक्तप३दमज्ञाय किमसत्कर्मभिर्भवेत्॥ १८

aiśvaraṃ śāstramutsṛjya bandhamokṣānudarśanam|

viviktapadamajñāya kimasatkarmabhirbhavet|| 18

अर्थ

भगवान्का स्वरूप बतलानेवाला शास्त्र हंसके समान नीर-क्षीर-विवेकी है। वह बन्ध-मोक्ष, चेतन और जडको अलग-अलग करके दिखा देता है। ऐसे अध्यात्मशास्त्ररूप हंसका आश्रय छोड़कर उसे जाने बिना बहिर्मुख बनानेवाले कर्मोंसे लाभ ही क्या है?॥ १८॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—रूपम०।

    (मुद्रित पृष्ठ 726)

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